भोपाल की ठंडी सुबह थी। आसमान में बादल छाए हुए थे और हल्की बारिश पूरे शहर को भिगो रही थी। सड़क किनारे चाय की दुकानों से उठती भाप और मिट्टी की खुशबू माहौल को और भी खूबसूरत बना रही थी। लोग जल्दी-जल्दी अपने काम पर जा रहे थे, लेकिन रिया बस स्टॉप पर अकेली खड़ी थी। उसके चेहरे पर हल्की परेशानी साफ दिखाई दे रही थी क्योंकि उसकी बस निकल चुकी थी।
रिया कॉलेज की सबसे शांत लड़कियों में से थी। उसे किताबें पढ़ना, बारिश देखना और अकेले समय बिताना पसंद था। वह अक्सर अपनी दुनिया में खोई रहती थी। उस दिन भी वह हाथ में किताबें लिए बस का इंतजार कर रही थी कि तभी एक बाइक उसके सामने आकर रुकी।
“Excuse me… कॉलेज तक छोड़ दूँ?” लड़के ने हेलमेट हटाते हुए कहा।
रिया ने उसकी तरफ देखा। पहली नजर में ही वह लड़का अलग लगा। चेहरे पर सुकून, आँखों में ईमानदारी और मुस्कान में अपनापन था।
“मैं अजनबियों के साथ नहीं जाती,” रिया ने हल्के गुस्से में कहा।
“तो दोस्त बन जाते हैं। मैं आदित्य।”
रिया चाहकर भी मुस्कान रोक नहीं पाई। उसने धीरे से बाइक पर बैठते हुए कहा, “रिया।”
उस दिन के बाद दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं। कभी कॉलेज कैंटीन में, कभी लाइब्रेरी में, तो कभी झील किनारे। आदित्य बहुत बातूनी था, जबकि रिया शांत स्वभाव की थी। लेकिन शायद यही फर्क उन्हें करीब ला रहा था।
बारिश अब दोनों की पसंद बन चुकी थी। हर बारिश में दोनों झील के किनारे बैठते और घंटों बातें करते। आदित्य हमेशा रिया के लिए गर्म चाय लेकर आता और कहता, “बारिश और चाय का रिश्ता बिल्कुल हमारे जैसा है।”
धीरे-धीरे दोनों को एहसास होने लगा कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं रही।
एक शाम झील किनारे बैठकर रिया ने पूछा—
“अगर मैं कभी तुमसे दूर चली गई तो?”
आदित्य ने उसका हाथ थाम लिया।
“फिर हर बारिश में तुम्हें ढूंढ लूँगा।”
रिया की आँखें भर आईं। उसने पहली बार महसूस किया कि कोई उसे सच में समझता है।
लेकिन जिंदगी हमेशा आसान नहीं होती।
कुछ महीनों बाद रिया के पिता का ट्रांसफर दिल्ली हो गया। रिया टूट चुकी थी। वह आदित्य को छोड़कर नहीं जाना चाहती थी।
आखिरी दिन दोनों उसी झील किनारे मिले जहाँ उनकी कहानी शुरू हुई थी।
बारिश हो रही थी।
रिया रोते हुए बोली—
“शायद अब हम कभी नहीं मिलेंगे।”
“प्यार दूरियों से खत्म नहीं होता।”
रिया ने उसे गले लगा लिया।
उस दिन दोनों अलग जरूर हुए, लेकिन उनका प्यार नहीं टूटा।
कई साल बाद…
भोपाल में फिर बारिश हो रही थी।
रिया उसी झील किनारे खड़ी थी।
तभी पीछे से एक आवाज आई—
“मैंने कहा था ना… हर बारिश में तुम्हें ढूंढ लूँगा।”
सामने आदित्य खड़ा मुस्कुरा रहा था।
और उस दिन बारिश फिर उनकी मोहब्बत की गवाह बन गई।